जिहाद, Jihad

जिहाद :

Amatya Parishad: जिहाद की चर्चा करने से पहले यह सही रहेगा कि हम इस्लाम और हजरत मुहम्मद के बारे में जान लें l

       इस्लाम कोई धर्म नहीं है बल्कि एक “मत” है क्योंकि इस्लाम की परम्पराओं की रचना एक ही व्यक्ति की सोच है l जिसके नियम एक ही व्यक्ति के द्वारा बनाये गए हैं दूसरा इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ “कुरान” में जिस अल्लाह की इबादत की गयी है यह अल्लाह चोरी, हत्या, बलात्कार जैसे गुनाहों को माफ़ कर देता है लेकिन अगर कोई व्यक्ति अल्लाह की सत्ता को मानने से इंकार कर देता है तो अल्लाह यह गुनाह कतई माफ़ नहीं करता l इस्लाम की नींव मुहम्मद ने रखी थी और इसलिए अल्लाह को भी केवल उतनी ही जानकारी थी जितनी जानकारी मुहम्मद को थी या फिर यह कह सकते हैं कि “गंगाधर ही शक्तिमान है” क्योंकि अल्लाह को भी उतनी ही जानकारी थी जितनी मुहम्मद को थी l जैसे कि “धरती का आकार एक थाली की तरह होना, सूर्य का पृथ्वी के चक्कर लगाना, धरती पर पहाड़ इसलिए रखे गए हैं कि कहीं धरती पलट न जाए…. ऐसी ही कई मनघडंत बातें कुरान में अल्लाह की वाणी बोलकर लिखी गई हैं l एक और बात इस्लाम में सभी मुसलमान अल्लाह के गुलाम हैं और इस्लाम अल्लाह का एक भयानक स्वरुप प्रस्तुत किया गया है जिसके कारण मुसलमान अल्लाह से डरता है उससे प्यार नहीं करता l आपने किसी मुसलमान के मुंह से “अल्लाह से प्यार करो” नहीं सुना होगा बल्कि यह जरूर सुन होगा कि “अल्लाह से डरो”, “अल्लाह का खौफ खाओ” । क्योंकि इस्लाम की तहजीब में प्यार का मतलब अपनी कामवासना को पूरा करना ही है ।

हज़रत मुहम्मद

इस चित्रण में बूढ़ा व्यक्ति 55 साल का है और छोटी बच्ची 9 साल की। ये दोनों को बाप-बेटी या दादा-पोती नहीं हैं बल्कि "शौहर-बेगम" यानि हिन्दी में पति-पत्नी हैं।
असल में यह चित्रण इस्लाम के पैगंबर हज़रत मुहम्मद और उनकी बेगम आएशा का है और यही वो हज़रत मुहम्मद है जिसे दुनियाँ का हर मुसलमान अपना आदर्श मानता है और उसके कदमों पर चलने का प्रयास करता है।

      अब इस्लाम के अंतिम पैगंबर हजरत मुहम्मद की बात की जाए तो सन 570 ईस्वी में अरब के मक्का में “मुस्तफा” उर्फ़ “हामिद” उर्फ़ “अहमद” उर्फ़ “मुहम्मद” का जन्म वहां जानवरों को काटकर बेचने वाले अब्दुल्ला कसाई (कुरेशी) के कबीले हुआ था l उस समय अरब में भारत की ही तरह देवताओं की पूजा होती थी l उन देवी देवताओं की आत्मा पेड़ों, पत्थरों, झरनों और कुओं से जुड़ी थी। साथ ही साथ मक्का के काबा मंदिर में देवी देवताओं की 360 मूर्तियां थीं । अपने चाचा के यहाँ पले-बढ़े मुहम्मद ने 25 वर्ष की आयु में 40 वर्ष की एक धनी औरत “खदीजा” से शादी की थी और 52 साल की उम्र में 6 साल की आएशा से शादी की थी और इस प्रकार मुहम्मद ने इनके अलावा 11 शादियाँ और की थीं यानि अपने पूरे जीवनकाल में कुल मिलाकर 13 शादी l जब मुहम्मद ने इस्लाम का प्रचार शुरू किया तब मक्का के वासियों ने मुहम्मद का बहुत विरोध किया जिसके कारण मुहम्मद को डर कर मक्का छोड़कर भागना पड़ा l असल में यह अरब के कबीलों का युद्ध था जो अक्सर एक दुसरे कबीले पर हमला करके लूटपाट किया करते थे किन्तु मुहम्मद ने इस युद्ध को एक वैचारिक युद्ध का रूप दे दिया जैसा कि आजकल विश्व भर में वामपंथियों ने कर रखा है मुहम्मद ने मजहब के नाम पर मुसलमानों को हिंसा और कामवासना परोसी और वासना भी ऐसी कि मरने के बाद भी जन्नत में 72 हूर मिलेंगी ।

      लूटपाट और अराजकता के आदि अरबी कबीलों के लोगों को मुहम्मद ने अल्लाह का नाम लेकर कहा “यह जमीन अल्लाह ने मुसलमानों के लिए बनाई है” “इस्लाम को न मानने वाले काफिरों की हत्या करने का हुक्म अल्लाह ने दिया है” और इसी को “जिहाद” का नाम दे दिया गया l  “जिहाद” अल्लाह को न मानने वालों के विरुद्ध किया जाता है जिन्हें “काफिर” नाम दिया काफिरों के विरुद्ध छल, बल, झूठ, फरेब और जो भी रास्ता मिले उसे अपनाकर उनको समाप्त करना ही जिहाद का मुख्य उद्देश्य है और जिहाद में लूटे हुए के माल को अल्लाह की ओर से “माल-ए-गनीमत” नाम दिया गया है l इस “माल-ए-गनीमत” के लूट के माल में धन-दौलत ही नहीं होती बल्कि काफिरों की कम उम्र की बेटियां और जवान औरतें भी होती हैं जिन्हें गुलाम बनाकर उनसे शारीरिक सम्बन्ध बनाने से लेकर उन्हें बाजार में निर्वस्त्र करके बेचने तक का आदेश अल्लाह ने दे रखा है l आज भी अगर ध्यान दिया जाए तो वैश्यावृति के अड्डे चलाने वाले मुसलमान ही होते हैं क्योंकि इस्लाम में वैश्यावृति करना जायज है l कुरान के साथ साथ इस्लाम में लिखित साहित्य हदीस भी है जो कि हर मुसलमान को पढ़ना आवश्यक है लेकिन इस हदीस नामक इस्लामिक साहित्य में इतनी अश्लील सामग्री भरी पड़ी है जो इन मुसलमानों की वासनाओं को और बढ़ा देती है l

अब इस्लाम में 72 फिरके (जातियाँ) हैं और ये सभी आपस में एक दूसरे को मुसलमान नहीं मानते और उन्हें काफिर कहते हैं । ये सभी एक दूसरे के खून के प्यासे हैं इसका उदाहरण आप इराक, सीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान आदि मुस्लिम देशों में देख सकते हो ।

      विश्व भर में इस्लाम को फैलाने के इरादे से मुहम्मद ने जिहाद का सहारा लिया लेकिन विश्व में जहाँ भी इस्लाम ने पैर जमाए वो ज्ञान या तर्क के दम पर नहीं बल्कि तलवार और आतंकवाद के बल पर ही जमाए l छोटे छोटे कबीलों में बंटा अरब जल्दी ही जिहाद की तलवार के तले आ गया l लेकिन उस समय भारत वैभव और ज्ञान-विज्ञान की दृष्टी से बहुत ही समृद्ध था और साथ ही साथ भारत के शौर्य और पराक्रम डंका समस्त विश्व में गूज रहा था l इसलिए चाह कर भी मुहम्मद भारत की ओर आने की हिम्मत न जुटा सका और अंत में मुहम्मद ने जन्नत जाने का रास्ता “गजवा-ए-हिन्द” से बना दिया l जिसके अनुसार जन्नत के रास्ते भारत पर इस्लाम का राज होने पर ही खुलेंगे l

इस हदीस में हज़रत अबू हुरैरा (R.A.) के माध्यम से भारत पर आक्रमण के वादे का जिक्र है।
गजवा ए हिन्द, Gazwa e Hind
यह हदीस भी अबू हुरैरा (R.A.) से संबंधित है, जिसमें वे उस युद्ध में शामिल होने की अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं।
गजवा ए हिन्द, Gazwa e Hind
इसमें उन दो समूहों का उल्लेख है जिन्हें नर्क की आग से सुरक्षित बताया गया है (एक हिन्द में युद्ध करने वाला और दूसरा ईसा अ.स. के साथ रहने वाला)।

ये सभी तथ्य सऊदी अरब से संचालित वेबसाईट sunnah.com में उपलब्ध हदीस से लिए गए हैं।

     इसीलिए इस्लाम के शब्दकोश में गजवा-ए-अमेरिका, गजवा-ए-चाइना, गजवा-ए-ब्रिटेन, गजवा-ए-आस्ट्रेलिया नहीं है बल्कि गजवा-ए-हिन्द ही है । एक व्यक्ति की काल्पनिक मूर्खता इस्लाम और उसके अल्लाह के नाम पर जिहाद के कारण आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समस्त विश्व इस इस्लामी राक्षस के आतंकवाद से पीड़ित है जिसके “लव-जिहाद“, “लैंड-जिहाद”, “जनसंख्या-जिहाद”, “थूक-जिहाद”, घुसपैठ-जिहाद, शरणार्थी-जिहाद” जैसे कई रूप हैं l हम सभी को इस विषय को जनजागरण हेतु प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाना चाहिए l

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